
वान्या की सांसें पहले से ही अटकी हुई थीं, पर वितांश के चेहरे पर वही पुरानी, खूंखार बेपरवाही थी। स्टोर रूम के उस छोटे से, बंद स्पेस में वितांश का ऑरा इतना भारी था कि वान्या को हवा भी कम लगने लगी थी। अभी वो खुद को संभालने की कोशिश ही कर रही थी कि वितांश ने बिना किसी झिझक के, एक हाथ से उसके कपड़ों को मुट्ठी में भींच लिया।
एक ही झटके में उसने वान्या को अपनी तरफ खींच लिया।








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