
वान्या ने अपनी भीगी, थकी हुई पलकें उठाईं और वितांश के पसीने से तरबतर, खूंखार चेहरे को देखते हुए बहुत ही बेबस आवाज़ में फुसफुसाई, "जिंदल साहब... प्लीज, अब... अब बाहर निकलिए... मुझसे और बर्दाश्त नहीं हो रहा।"
लेकिन वितांश के चेहरे पर उस समर्पण का कोई असर नहीं हुआ। उसने अपने भारी, मजबूत पैरों से वान्या की दोनों नाज़ुक टाँगों को और कसकर दबा दिया, जिससे वो एक इंच भी हिल न सके।








Write a comment ...