
कमरे के धुंधले सन्नाटे में माहौल बेहद भारी, गर्म और नशीला हो चुका था। खिड़की से छनकर आती हल्की रोशनी में परछाइयों की हलचल तेज़ थी। वो अजनबी डॉक्टर पूरी ताकत और जुनून के साथ मेनिका पर हावी था, और मेनिका हर झटके के साथ आगे की तरफ मचल रही थी।
उसकी उखड़ी हुई सांसें और बेकाबू आहें कमरे की दीवारों से टकरा रही थीं। वो अपनी ही मदहोशी में डूबकर आईने के सामने कांपते हुए फुसफुसाने लगी:








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