
सुबह की हल्की, गुनगुनी धूप जब मास्टर बेडरूम के भारी पर्दों से छनकर बेड पर आई, तो वितांश की भारी पलकें धीरे-धीरे खुलीं। होश में आते ही उसने आदतन अपनी बांहों को ब्लैंकेट के भीतर फैलाया ताकि अपनी 'चोकोबार' को अपने सीने से चिपका सके, लेकिन उसके हाथ सिर्फ ठंडी, खाली चादर से टकराए।
बेड का वो हिस्सा पूरी तरह से खाली था। वितांश की आँखें एक झटके में पूरी तरह खुल गईं। वान्या को अपने पास न पाकर उसके भीतर एक अजीब सी बेचैनी और हड़बड़ाहट दौड़ गई। वो झटके से उठकर बेड पर बैठा और अपनी गहरी, लाल पड़ी आँखों से पूरे कमरे में वान्या को ढूँढने लगा।








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