
वान्या की हिचकियां अब एक गहरे दर्द में बदल चुकी थीं। वितांश के मजबूत हाथों की जकड़, जो उसके नग्न बूब्स को पूरी बेरहमी से भींच रही थी, उसे तड़पा रही थी।
वान्या ने रोते हुए अपना चेहरा थोड़ा घुमाया और आँसुओं से धुंधली हो चुकी आँखों से वितांश की तरफ देखा। उसकी आवाज़ में बेबसी और एक तीखा उलाहना था, "बस यही... यही तो करते हैं आप हमेशा, जिंदल साहब! कभी ऑफिस में ज़बरदस्ती इंटिमेसी, तो कभी इस घर के बंद कमरों में! मैं जहाँ मिलूँ, जब मिलूँ, बस आपको मेरे जिस्म के साथ इंटीमेट होना होता है। आपको सिर्फ अपनी भूख मिटानी होती है। तो... तो हो लीजिए इंटीमेट! कर लीजिए जो करना है!








Write a comment ...