
घड़ी में रात के दो बज चुके थे। पूरे जिंदल हाउस की लाइटें बुझ चुकी थीं और चारों तरफ एक भारी, संदेहास्पद खामोशी पसरी हुई थी। तभी, अपने-अपने कमरों से बेहद दबे पाँव दो साये बाहर निकले। एक तरफ से कायश के पिता अरविंद और दूसरी तरफ से वान्या की मामी मेनिका। दोनों बिना कोई आवाज़ किए, सीढ़ियों के नीचे बने उस सुदूर कोने वाले पुराने स्टोर-रूम जैसे कमरे के भीतर सरक गए और तुरंत दरवाज़ा अंदर से लॉक कर लिया।
कमरे के भीतर सिर्फ एक मद्धम सी पीली रोशनी जल रही थी। अरविंद हमेशा की तरह एकदम शांत खड़ा था। उसके चेहरे पर कोई हड़बड़ाहट नहीं थी, लेकिन उसकी आँखें इस बात की गवाह थीं कि वो अंदर ही अंदर अपने सौतेले भाई वितांश के खौफ से वाकिफ है।








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