
काफी वक्त बाद, जब वान्या की सांसें पूरी तरह उखड़ने लगीं, तब वितांश ने बेहद भारी मन से अपने होंठ उसके होंठों से अलग किए। दोनों के होंठों के बीच लार (saliva) का एक बारीक, गीला धागा सा खिंचकर टूट गया। वान्या का पूरा चेहरा लाल हो चुका था और वो हाँफते हुए तेजी से सांसें ले रही थी।
वितांश ने वान्या के चेहरे को अपने दोनों हाथों की हथेलियों में ऊपर उठाया। उसकी आँखें इस वक्त पूरी तरह काली और गहरी थीं, जिनमें दीवानगी का एक नया रंग था। वो उसकी आँखों में सीधे देखते हुए, बेहद मखमली और भारी आवाज़ में बोला, "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, वान्या... बेइंतहा प्यार करता हूँ।"








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