
वान्या की साँस ही सूख गई थी, रीढ़ की हड्डी तक काँप गई थी। ऐसा लग रहा था कि फेफड़े तक बाहर आ जाएँगे। वितांश ने ऐसी आवाज में कहा था, ये आवाज ही अलग तरह की थी। उसे हर वो वक्त याद आ रहा था जिस तरह से वितांश ने उसे पकड़ने की,
छूने की हिम्मत की थी, कैसे रात भर उसे तड़पाया था अपने नीचे। बिस्तर का कोई कोना और कमरे का कोई कोना नहीं बचा था जहाँ पर वितांश ने अपनी हसरत उसके साथ पूरी नहीं की हो। अब जब इतना सब कुछ कर चुका है, तो इतनी जल्दी तो उसे इसके करीब नहीं आना चाहिए था। थोड़ी तो उसकी हवस पूरी हुई होगी, पर नहीं, उसकी आवाज सुनकर तो ऐसा नहीं लग रहा था।








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