
वान्या की तो आंखों से आंसू गिरने लगे थे। उसके पैरों के पास अब जमीन नहीं बची थी। हाथ थरथराने लगे थे।
वान्या के कानों में अपनी बहन के सिसकने की आवाज़ तो पड़ रही थी, लेकिन उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसके चेहरे पर न गुस्सा था, न कोई शिकवा, बस एक पथराई हुई वीरानी थी। उसे अपनी बहन से कोई शिकायत नहीं करनी थी, क्योंकि जिस भरोसे के दम पर वो लड़ सकती थी, वही भरोसा आज मंडप की राख में मिल चुका था।








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